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संक्षेप
चैत माह को आयुर्वेद में “मधु मास” कहा जाता है, जो शरीर की शुद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान मीठे पदार्थों से परहेज करने और सुबह खाली पेट नीम की कोपल व काली मिर्च का सेवन करने की सलाह दी जाती है। यह उपाय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और रक्त शुद्धि में सहायक बताया गया है।
यूपी समाचार न्यूज़। चैत माह के आगमन के साथ ही मौसम में बदलाव शुरू हो गया है। आयुर्वेद में इस माह को “मधु मास” कहा जाता है, जो शरीर की आंतरिक शुद्धि और संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार इस दौरान खान-पान और दिनचर्या में थोड़े बदलाव करके पूरे वर्ष स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखा जा सकता है।
आयुर्वेदिक मान्यताओं के अनुसार चैत माह में शरीर के अंदर संचित दोषों को संतुलित करने का यह सर्वोत्तम समय होता है। इस अवधि में विशेष रूप से मीठे पदार्थों के सेवन से परहेज करने की सलाह दी जाती है। कहा जाता है कि इस समय रक्त में प्राकृतिक रूप से मिठास की मात्रा अधिक होती है, इसलिए अतिरिक्त शर्करा का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस माह में सुबह खाली पेट नीम की ताजी कोपल (8-10 पत्तियां) और एक-दो दाने काली मिर्च का सेवन करना लाभकारी होता है। यह मिश्रण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने, रक्त शुद्ध करने और संक्रमण से बचाव में सहायक माना जाता है।
नीम के औषधीय गुणों के कारण यह शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करता है, वहीं काली मिर्च पाचन क्रिया को दुरुस्त रखने में सहायक होती है। नियमित सेवन से शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ता है और जीवनी शक्ति मजबूत होती है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि चैत माह में अपनाई गई यह दिनचर्या मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में भी सहायक हो सकती है। हालांकि, किसी भी नए उपाय को अपनाने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है।
